Poet

संतोष का पहला कविता संग्रह 'कही और सच होगें सपने' 1983 में प्रकाशित हुआ जिसे मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का दुष्यंत कुमार पुरस्कार प्राप्त. उसके बाद उपन्यास 'राग केदार' (1990) और कहानी संग्रह 'हल्के रंग की कमीज़' (1992) तथा 'रेस्त्रां में दोपहर' (1999) प्रकाशित तथा चर्चित. फ्रेडरिक जेमसन, वॉल्टर बैंजामिन तथा ओडिसस इलाइटिस के निबंधों का अनुवाद जो क्रमशः 'नया पथ' 'पहल' तथा 'उद्भावना' में प्रकाशित.


दस से अधिक विज्ञान नाटकों का लेखन तथा मंचन. `गैलीलियो' का हिंदी में अनुवाद और ब्रेख्त की कहानी 'सुकरात घायल हुआ' का नाट्य रूपांतरण. भारत भवन के 'कथा देश' समारोह में तथा राष्ट्रीय नाट्य समारोह में उनकी चार कहानियों का मंचन.


'कम्प्यूटर' पर हिंदी में देश की पहली किताब 'कम्प्यूटर : एक परिचय' का लेखन जिसे भारत सरकार का मेघनाद साहा पुरस्कार प्राप्त हुआ. इसी विषय पर पांच अन्य पुस्तकें लिखी जो पुरस्कृत तथा सम्मानित हुई और पूरे उत्तर भारत में लाखों की संख्या में बिकीं. बच्चों के लिये 'कम्प्यूटर की दुनिया' एवं 'कम्प्यूटर आपके लिये' श्रृंखला में छः अन्य पुस्तकों का लेखन. इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी पर देश की पहली हिंदी पत्रिका "इलेक्ट्रॉनिकी" आपके लिये' का पिछले 18 वर्षो से सतत संपादन. हिंदी में सूचना प्रौद्योगिकी पर लेखन के लिये मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी का डॉ. शंकर दयाल शर्मा पुरस्कार (2005) प्राप्त.


'हंस' , 'कथन', 'जनसत्ता' , 'साक्षात्कार' , 'वर्तमान साहित्य' , 'धर्मयुग' 'नया पथ', 'पहल' , 'नई दुनिया' , 'उद्भावना' , 'पहले-पहल' , 'वागर्थ' , तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें नियमित रूप से प्रकाशित. करीब पंदह वर्षो तक उद्भावना के संपादक मंडल में रहे एवं उसके कहानी अंक का संपादन भी किया.

संतोष चौबे एवं राजेश जोशी

'सूत्रधार' भिलाई द्वारा आयोजित रचना पाठ में, साथ है कवि नासिर अहमद सिकंदर, शिक्षा शास्त्री डी. एन. शर्मा एवं कथाकार परदेसीराम वर्मा

'कौतुक' रायपुर द्वारा आयोजित कहानी पाठ में

'सूत्रधार' के छत्तीसगढ़ सम्मेलन में रामप्रकाश त्रिपाठी, संतोष चौबे, राजेश जोशी एवं विभाष उपाध्याय

बिलासपुर में 'रेस्त्रां में दोपहर'

मनुष्यता के पक्ष में खड़ी कविता

‘रेस्त्रां में दोपहर’ तथा ‘हल्के रंग की कमीज’ जैसे कहानी-संग्रह तथा ‘राग केदार’ और ‘क्या पता कामरेड मोहन’ जैसे उपन्यास लिखकर चर्चा में आए कथाकार संतोष चौबे मूलतः कवि हैं यह तथ्य उन पाठकों के लिए नया नहीं हो सकता जिन्होंने करीब बीस साल पहले प्रकाशित उनका पहला कविता संग्रह ‘कहीं और सच होंगे सपने’ पढ़ा होगा। वे कदाचित् इस बात की गवाही देने को भी तैयार हो जाएँगे कि संतोष चौबे की कविताएँ अक्सर पत्र-पत्रिकाओं के जरिये उन्हें पढ़ने को मिलती रही हैं और उनका गद्य भी एक तरह की काव्यात्मक संवेदना से संयुक्त है। इसलिये यह कहानी सही होगा कि लंबे अंतराल के बाद आए अपने इस दूसरे कविता-संग्रह के बावजूद, संतोष चौबे कविता से कभी अलग या दूर नहीं रहे हैं।

वे इस आत्म विज्ञापनी युग में भी उन परंपरागत मूल्यों को अपने में सहेजे हुए हैं जिनके रहते वे अपना प्रचार तो क्या अपने बारे में दो शब्द तक कहने से कतराते रहे हैं। उन्हें लगता ही नहीं कि जिन सैकड़ों परियोजनाओं को उन्होंने हाथ में लिया और सफलतापूर्वक पूरा किया, या सेमीनारों, कार्यशालाओं में सक्रिय भागीदारी निभाई या देश-विदेश में काम को लेकर दौड़ते रहने की तत्परता दिखाई उसमें भी कुछ उल्लेखनीय था। यदि कुछ सार्थक किया और जिससे संतुष्टि मिली तो वह था प्यार-जिसने भीतर से बदला, संगीत-जिसका रस आज भी उन्हें सराबोर करता है या वह संघर्ष जो वे सच को झूठ से अलगाने के लिए करते रहे हैं। यही उनका जीवन वृत्त है।

उनकी कविताएँ उन सब मामूली चीजों को बचाए रखने की कोशिश करती हैं जो मनुष्य को मनुष्य बनाती हैं। वे लगातार होती बारिश में किसी अच्छी-सी पुस्तक को पढ़ने या छत पर सोते हुए कोई अच्छा सा सपना देखने से मिलने वाली ख़ुशी को बचाए रखना चाहते हैं। वे अम्मा के उस रेडियो को सुरक्षित रखना चाहते हैं जो उन सैकड़ों टीवी चैनलों को चुनौती देता है जिनके दिन-रात प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों से एक बार भी अम्मा की दुलारभरी आवाज सुनाई नहीं देती।

प्यार संतोष चौबे की कमजोरी है। इसे पाने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। संग्रह की पहली ही कविता प्यार की उनकी परिकल्पना को अद्भुत रूप से प्रस्तुत करती है। ‘आना/जब धन बहुत न हो/पर हो/हो यानी इतना/कि बारिश में भीगते/ठहर कर कहीं/ पी सकें/एक प्याला गर्म चाय/कि ठंड की दोपहर में/निकल सकें दूर तक/और जेबों में भर सकें। मूंगफलियाँ। ‘छोटी-छोटी चीजों में परम सुख तलाशने वाली उनकी कविताएँ जब आधुनिक विकास के विद्रुपों से रूबरू होती हैं तो मिलमिला देने वाली व्यंग्यात्मकता को इस्तेमाल करने में भी नहीं हिचकिचाती। ‘मेरे अच्छे आदिवासियों/विस्थापित हो जाओ/ताकि हम स्थापित हो सकें/पर देखो/दे देना पता अपना/क्योंकि बुलाएँगे हम तुम्हें/कभी कभी/नाचने/अपने राष्ट्रीय पर्व पर।’ पहले हम तुम्हें तुम्हारे जीवनयापन के साधनों-जल, जंगल, जमीन से बेदखल करेंगे और फिर तुम्हें अपनी संस्कृति का रंग-बिरंगापन दिखलाने के लिए शोकेस में सजाकर रखेंगे। ‘बैठक बाज’ में उस व्यक्ति का कैरीकेचर है जो दुनिया बदलने की चेष्टा में निरंतर स्वयं को बदलता रहता है।

नई अर्थव्यवस्था ने सारी परिवर्तनकामी क्रांतिकारी युवाशक्ति को स्वयंसेवी संस्थाओं में नियोजित कर पथभ्रष्ट कर दिया है। इसका कटु किंतु तथ्यात्मक विवरण ‘कभी तो खत्म होगी परियोजना’ पढ़कर पाया जा सकता है। यह कविता अपनी शुरूआत ही इन्कलाबी तेवरों की परत उधेड़ने से करती है- ‘क्रांति के स्वप्न को घेर लेंगी/परियोजनाएँ/और समय से टकराने की जबरदस्त ताकत/बदल जाएगी/किसी काले जादू के प्रभाव से/अपने को सुरक्षित/और सुरक्षित बनाने की कोशिश के रूप में।’ लोगों के सामने परियोजना समव्यक उनके हकों के लिए लड़ते दिखाई देंगे लेकिन सरकार के सामने घिघियाते नजर आएँगे। नई-नई परियोजनाओं से धन प्राप्त करने के लिए वे नए-नए तर्क गढ़ते रहेंगे और उनके समर्थन के लिए नित नए बुद्धिजीवी एवं विशेषज्ञ पैदा करते रहेंगे। इनका काम किसी कमी को पूरा करना, किसी समस्या का समाधान करना नहीं बल्कि सब कुछ इसी तरह चलते रहने देना होगा क्योंकि तभी इनकी क्रांति एक ही जगह घूमने के बावजूद आगे बढ़ने का भ्रम पैदा करती रहेगी।

संतोष चौबे की ये कविताएँ एक ओर जहाँ मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के लिए आवश्यक मूल्यों को बचाए रखने की जद्दोजहद करती दिखाई देती हैं वहीं दूसरी ओर विकास के नाम पर होने वाले उत्पीड़न का विरोध और इससे फायदा उठाने वाले लोकोपकारकों के बनावटी नकाब उतारती प्रकट होती हैं। अपने समय को समझने के लिए इन्हें बार-बार पढ़ा जाना चाहिए।


सुरेश पंडित

जिंदगी के खुलते अर्थ

हवा, पानी, आकाश, धरती, प्रेम, विज्ञान, विकास.... इन सारे शब्दों का अर्थ होना चाहिये जिंदगी। संतोष की कविताओं के अर्थ जिंदगी में खुलते हैं। ये कविताएँ संवेदनभरा एकांतिक प्रलाप नहीं है; समाज, समस्या और देश के प्रति आरोपों, शिकायतों की गठरी भी नहीं हैं ये कविताएँ, वैचारिक बवंडरों, प्रेम-घृणा, आवेश के तीखे स्वरों के बावजूद बड़बोलेपन से मुक्त है संतोष चौबे की काव्य चेतना। न हथेली पर क्रांति का पौधा रोपने की जल्दबाजी है उनमें और न निराशा की छाया। अडिग विश्वास और आस्था वाली कविताओं में स्वप्निल तरलता की कोई जरूरत महसूस नहीं होती। कवि ठोस जमीन पर खड़ा है, अपने परिवेश परिस्थितियों, सामाजिक जटिलताओं और वैचारिक संघर्ष से आँखें चार करता हुआ।

संतोष के इस संग्रह में दो धाराएँ स्पष्ट रूप से पहचानी जा सकती हैं। जहाँ संग्रह के शुरूआत में वे कविताएँ संग्रहित हैं जहाँ कवि एक सहज आत्मीय संवाद और बिंबों तथा प्रतीकों के माध्यम से माँ, प्रेम, दोस्ती, जीवन और सफलता, असफलता जैसे विषयों से हमारी पहचान कराता है वहीं बाद की कविताएँ उसकी वैचारिक पुख्तगी और विचारधारात्मक विकास का संकेत देती हैं। इन कविताओं में रिटाॅरिक का इस्तेमाल कविता को और असरदार बनाता है।

इस संग्रह के प्रथम संस्करण को मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का ‘दुष्यंत कुमार पुरस्कार’ मिला था। मुझे उम्मीद है कि इस दूसरे सम्बंधित संस्करण को भी, जिसमें उनकी कुछ बाद की कविताएँ भी शामिल की गई हैं, उसी सप्ताह और चाव के साथ पढ़ा जाएगा।

रामप्रकाश

धीरे-धीरे सुलगती आँच की कविता

संतोष चौबे के इस संग्रह में संतोष का कवि एक साथ दो मुकाम पर खड़ा है। एक तरफ उनका अपना तमाम वैज्ञानिक सोच और सोच से व्यावहारिक रूप से जुड़ा कर्म है, और दूसरी तरफ है वह प्रतिबद्धता, जो आज के हर बुद्धिजीवी को उकसाती है। संतोष का कवि इस तरह दो मुकामों पर एक साथ संघर्ष कर रहा है। एक के जरिये जो दबाव है वह पिछली शताब्दी की प्रकृति और इस शताब्दी की आशंकाओ का दबाव है और दूसरा, वैचारिक दबाव है। संतोष ने कोशिश की है दोनों में से किसी एक को बेहतर तरीके से चुनकर कविता के लिए इस्तेमाल करें और इस चुनाव में वैचारिक दबाव उनकी रचना में घनीभूत हुआ हैं वे वैज्ञानिकता के तमाम बोझों को अलग रखकर साफ और सधी हुई कविता करते हैं। संतोष की कविताओं का गुण यही है कि वे भाषा के उस तनाव तत्व को पहचानते हैं जिससे शब्द कविता में आकर सार्थक होता है और कविता को ताप प्रदान करता है। संतोष के पास कविता के रूप और संवेदना तत्व की पूरी समझ है। भाषा में भी वे सहज होकर कविता का हर शब्द सादगी के साथ चुनते हैं। उनकी याद की कविताएँ विचारधारागत साक्ष्य दे डालती हैं पर अपनी प्रकृति में वे सहज और असरदार कवि हैं। जैसे कवि ने खुद संग्रह की शुरूआत में कहा है, संतोष का काव्य धीरे-धीरे सुलगती विचारों की आँच का काव्य है।


रमेश दवे

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